राजीव गांधी: दूरदर्शी नेतृत्व और कंप्यूटर-तकनीक की नींव

राजीव गांधी “India missed the Industrial Revolution; it cannot afford to miss the Computer Revolution.” Rajiv Gandhi

आज भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न श्री राजीव गांधी की जयंती पर हम उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन  करते हैं। राजीव गांधी जी का नाम भारत में कंप्यूटर क्रांति, तकनीकी बदलाव, सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार के विस्तार के अध्याय के आरम्भ से जुड़ा है। अपने दूरदर्शी नेतृत्व में उन्होंने यह समझा कि भविष्य में विज्ञान और तकनीक भारत की प्रगति में ,महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उनके प्रयासों ने देश में आधुनिक तकनीक के लिए नई सोच और नई संभावनाओं का रास्ता खोला।

भारत में कंप्यूटर, कंप्यूटर क्रांति और सूचना प्रौद्योगिकी

भारत में कंप्यूटर, कंप्यूटर क्रांति और सूचना प्रौद्योगिकी के विकास की बात होती है तो पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न राजीव गांधी जी के दौर का जिक्र जरूर आता है। आज कंप्यूटर और तकनीक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं, लेकिन 1980 के दशक में स्थिति बिल्कुल अलग थी। उस समय कंप्यूटर आम लोगों के लिए नई और कुछ हद तक अनजानी चीज थी। राजीव गांधी जी ने उस समय यह समझने की कोशिश की कि आने वाले वर्षों में तकनीक भारत के विकास में कितनी बड़ी भूमिका निभा सकती है।

विज्ञान, तकनीक, कंप्यूटर और दूरसंचार

राजीव गांधी का प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल 31 अक्टूबर 1984 से 2 दिसंबर 1989 तक रहा। प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने विज्ञान, तकनीक, कंप्यूटर और दूरसंचार को लेकर खास जोर दिया। उनका मानना था कि भारत को आगे बढ़ना है तो उसे नई तकनीक से दूर नहीं रहना चाहिए। उस समय कंप्यूटर को लेकर उत्सुकता भी थी और डर भी। कई लोगों को आशंका थी कि अगर मशीनें काम करने लगीं तो लोगों की नौकरियां खत्म हो जाएंगी। ट्रेड यूनियनों और कुछ राजनीतिक समूहों ने कंप्यूटरीकरण का विरोध भी किया।

यह चिंता उस समय पूरी तरह समझ में आती थी। आखिर किसी भी नई तकनीक के आने पर सबसे पहला सवाल यही होता है कि इसका असर आम लोगों के रोजगार पर क्या पड़ेगा। लेकिन समय के साथ तस्वीर काफी बदल गई। कंप्यूटर ने कुछ पुराने कामों को जरूर बदला, लेकिन इसके साथ ही नए काम और नए उद्योग भी पैदा हुए।

देश की नई पीढ़ी विज्ञान और आधुनिक तकनीक से परिचित हो

राजीव गांधी की सोच केवल सरकारी दफ्तरों में कंप्यूटर लगाने तक सीमित नहीं थी। वे चाहते थे कि देश की नई पीढ़ी विज्ञान और आधुनिक तकनीक से परिचित हो। 1986 की नई शिक्षा नीति में तकनीकी साधनों के इस्तेमाल पर जोर दिया गया। स्कूलों और उच्च शिक्षा संस्थानों में कंप्यूटर और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में भी कदम उठाए गए।

टेलीफोन कनेक्शन मिलना भी आसान नहीं था

दूरसंचार के क्षेत्र में भी उस समय बदलाव की शुरुआत हुई। आज मोबाइल फोन और इंटरनेट हमारे लिए सामान्य बात है, लेकिन उस दौर में टेलीफोन कनेक्शन मिलना भी आसान नहीं था। खासकर गांवों और छोटे शहरों में संचार की सुविधाएं सीमित थीं। दूरसंचार के विस्तार पर जोर देने से भारत में संचार व्यवस्था को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

निजी क्षेत्र में तकनीकी शिक्षा के अवसर

धीरे-धीरे कंप्यूटर को लेकर लोगों की सोच भी बदलने लगी। कंप्यूटर प्रशिक्षण संस्थान खुलने लगे और निजी क्षेत्र में तकनीकी शिक्षा के अवसर बढ़ने लगे। सरकारी कामकाज, बैंकिंग, उद्योग और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में कंप्यूटर के इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ती गईं।

तकनीक से जुड़ी पहल का असर

राजीव गांधी का प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल 1989 में समाप्त हो गया, लेकिन उनके समय में शुरू हुई तकनीक से जुड़ी पहल का असर आगे भी दिखाई देता रहा। 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत का दुनिया के बाजार से जुड़ाव बढ़ा। इसी दौर में भारतीय आईटी और सॉफ्टवेयर उद्योग ने तेजी से आगे बढ़ना शुरू किया।

बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और नोएडा जैसे शहर धीरे-धीरे तकनीकी केंद्र बन गए। भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियों ने दुनिया में अपनी पहचान बनाई और भारत एक बड़े आईटी सेवा केंद्र के रूप में उभरा।

आज हम जिस भारत को इंटरनेट, मोबाइल, डिजिटल भुगतान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ देखते हैं, उसकी यात्रा एक दिन में नहीं हुई। इसके पीछे कई दशकों के प्रयास हैं। इस पूरी यात्रा में राजीव गांधी का दौर एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। उस समय कंप्यूटर और आधुनिक तकनीक को लेकर जो सोच और नीतिगत दिशा सामने आई, उसने भारत को आने वाले तकनीकी बदलावों के लिए तैयार करने में एक भूमिका निभाई।

यह संक्षिप्त आलेख श्री शर्मा द्वारा लिखा गया हैं

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