महान उद्योगपति जमशेदजी टाटा

जमशेदजी टाटा

टाटा ग्रुप उद्योग जगत के बड़े नामों में से एक है। कौन होगा जो टाटा ब्रांड से परीचित नहीं….टाटा नमक, टाटा मोटर्स, टाटा कंसल्टी और भी कुछ। टाटा ग्रुप ने, फूड इंडस्ट्री से लेकर मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी तक हर क्षेत्र में अपने ब्रांड का प्रसार किया है। लेकिन क्या आप जानते हैं, इन सब की शुरुआत करने वाले और टाटा के नाम को पहचान दिलाने वाले जमशेदजी टाटा के बारे में…. अगर नहीं तो… आज के लेख में हम जमशेदजी टाटा और उनके जीवन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर नजर डालने का प्रयास करेंगे।

जमशेदजी टाटा का जीवन परिचय:

जमशेदजी टाटा का जन्म सन् 1839 में 3 मार्च के दिन हुआ था। वे एक पारसी परिवार में जन्में थे। जमशेदजी के पिताजी नुसीरवानजी और माता जीवनबाई टाटा थी। नुसीरवानजी अपने सपने पूरे करने मुम्बई चले आए, जिसमें उनका साथ जमशेदजी ने भी दिया, जो 14 साल की छोटी सी उम्र में ही अपने पिता का हाथ बंटाने के लिए उनके साथ मुंबई चले आए। जमशेदजी ने कॉलेज खत्म करने के बाद पूरी तल्लीनता से खुदको पिताजी के व्यवसाय में समर्पित कर दिया। लेकिन वे यहीं नहीं रुके, सन 1868 में उन्होंने खुद का व्यापार शुरू कर दिया।

जमशेदजी टाटा से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य:

जमशेदजी टाटा ने अपने व्यापार की शुरुआत में एक बंद हो चुकी तेल मिल को खरीदकर उसका रूपांतरण एक रूई मिल के तौर पर कर दिया।
तेल की यह मिल जमशेदजी के लिए सफलता का कदम साबित हुई क्योंकि दो साल बाद ही उन्होंने इसे अच्छे खासे मुनाफे के साथ बेच दिया। इस पैसे से उन्होंने सन 1874 में ही नागपुर में एक रूई मिल को खरीदा।

इसके बाद तो जैसे जमशेदजी टाटा के व्यापार ने मानो नई रफ़्तार पकड़ ली हो वे एक के बाद एक सफलता की सीढियों को पार करते चले।  उनका श्रमिकों से गहरा सरोकार रहा, और व्यवसाय की प्रगति के लिए उन्होंने श्रमिकों को भी पूरा सम्मान दिया।

एक कुशल व्यापारी होने के साथ-साथ जमशेदजी टाटा देशप्रेमी भी थे। उस समय अंग्रेजो के होटल्स में भारतीयों को जाने की अनुमति नहीं होती थी। जिसे देखते हुए जमशेदजी ने ताज होटल को बनवाने की घोषणा कर दी जिसके बाद 1902 में यह होटल बनकर तैयार भी हो गया था। यह होटल उस समय का पहला ऐसा भारतीय होटल था जिसमें बिजली की सुविधा दी गई थी।

जमशेदजी टाटा अपने जीवनकाल में लगातार सफलता की राह पर बढ़ते हुए कार्य करते रहे। सन 1904 में 19 मई के दिन जर्मनी के बैड नौहेम में उनका निधन हो गया।

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