बदलते परिवेश में ट्रेड यूनियन व युवाओं की भूमिका

बदलते परिवेश में ट्रेड यूनियन

भारत में ट्रेड यूनियनो श्रमिक संघ  को  देश के मजदूरों, श्रमिकों के अधिकार की मांगो, उनकी आवाज को उठाने, उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए जाना जाता हैं । ट्रेड यूनियन  भारत में श्रमिकों की आवाज को एक समूह में एकत्र कर उनके बेहतर भविष्य के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है।

भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन की नीवं स्वतंत्रता से पूर्व रखी गयी थी। उस समय यह आंदोलन उन श्रमिकों पर केंद्रित था, जो मुख्यत उत्पादन के क्षेत्र में काम करते थे।  इस आंदोलन के मुख्य उद्देश्यों में श्रमिकों की स्वतंत्रता, सुरक्षा, उनकी मज़दूरी में वृद्धि, उनके अन्य अधिकारों की रक्षा करना था। इस दौर में मजदूरों की स्थिति काफी कमजोर थी वहीँ कई बड़ी चुनौतियां भी सामने थी।

हम इतिहास पर सीमित ना रहते हुए बदलते परिवेश में ट्रेड यूनियन की भूमिका पर चर्चा करते हुए  यही  यह बात कहीं जाए कि बदलते  परिवेश में ट्रेड यूनियन की भूमिका पहले से अधिक सम्बद्ध  हो चुकी है। कई बार यह आलोचना की जाती है की ट्रेड यूनियन का दौर बीत चुका हैं अब इनकी जरुरत नहीं , यह सोच पूंजीवादी सोच से प्रेरित है तथा इसके पीछे ट्रेड यूनियनो के अस्त्तिव को कमजोर करने का प्रयास लगता हैं। अगर हम पिछले कुछ घटनाक्रम को देखें फिर बात सामने है कि वाकई  में आज ट्रेड यूनियन आंदोलन चुनौती के दौर से गुजर रहा है ऐसे दौर में ट्रेड यूनियन संगठन  एक साथ एक मंच पर भी आये है। दस ट्रेड यूनियन संगठनो का मंच काफी लम्बे आरसे से अपने साँझा कार्यक्रम जारी रखे हैं।

युवाओं कि भूमिका –किसी भी कार्य को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अगली पीढ़ी की होती हैं, नए दौर की ट्रेड यूनियन आंदोलन को अगर हम एक युवा की दृष्टि से देखें तो सबसे पहले यह बात मानने लायक है की युवा ट्रेड यूनियन के प्रति अधिक उत्साहित नहीं है, युवा थोड़ी दूरी पर खड़ा दिखता हैं। वह अपने काम को बेहतर ढंग से करना चाहता है कैरियर बनाना चाहता है।  बातचीत से पता चलता हैं की युवाओ में एक हिस्सा ट्रेड यूनियन के प्रति एक धारणा और भी रखता है की ट्रेड यूनियन का दौर पहले कभी हुआ करता था जिसमें हड़ताल और विरोध प्रदर्शन हुआ करते थे। ट्रेड यूनियन की हमें क्या आवश्यकता, हम वैश्वीकरण के दौर में हैं यह पुराने वक्त की बात हैं। पर एक आशा की किरण तब दिखती हैं जब युवा कहता हैं यह नहीं होना चाहिए या इसे रोकना चाहिए, हमारा अधिकार हैं, हमें बेहतर सुविधाएं मिलनी चाहिए। तब वह ट्रेड यूनियन के मंच से अपनी बात एक समूह के माध्यम से कहना चाहता हैं क्योंकि एक बात सभी जानते हैं संगठन में शक्ति होती हैं ।

युवाओं को नेतृत्व प्रदान करना आवश्यक- ट्रेड यूनियन को नजदीक से देखने की आवश्यकता हैं 

ट्रेड यूनियन को युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए नई प्रकार की गतिविधियों को सामने रखा जा सकता हैं।  ट्रेड यूनियन की भूमिका एक अध्यापक की भूमिका है जो कामगारों को जागरुक भी करता है अच्छाई और बुराई के बारे में बताता है उनके स्वास्थ्य के बारे में उनके करियर के बारे में भी चर्चा कर सकता है।युवाओ को नेतृत्व प्रदान करने की भी आवश्यकता हैं  अगर हम संपूर्ण परिपेक्ष में ट्रेड यूनियन की भूमिका पर नजर डालें तो यह बात साफ है कि जिस  इंडस्ट्री में, संस्थान में ट्रेड यूनियन की स्थिति मजबूत  नहीं होती वहां अपने आपसी सद्भाव वर्कर्स पार्टिसिपेशन जैसे शब्द हाशिये पर चले जाते हैं। ट्रेड यूनियन सेतु के रूप में प्रबंधन व श्रमिकों की बीच दूरी को पटाता है विवादों को कम करने में एक बड़ी भूमिका अदा करता है। प्रबंधन की बात श्रमिकों तक बेहतर ढंग से पहुँचाने की भूमिका अदा करता है। नई नीतियों योजनाओं से कर्मचारियों को रूबरू कराता है और उद्योग में एक शांति दूत की भूमिका निभाकर औद्योगिक प्रगति में सहायता करता हैं।वैश्वीकरण के दौर में ट्रेड यूनियन की भूमिका बदल चुकी हैं पर काफी बढ़ चुकी है।

सृजनात्मक ट्रेड यूनियन-एक सृजनात्मक ट्रेड यूनियन कर्मचारियों को मजदूरों को उनका हक दिलाने के लिए अपनी गतिविधियां जारी रखती हैं।  जैसा कि महात्मा गांधी जी ने भी कहा था,  हड़ताल मजदूरों की बात को रखने का बड़ा माधयम है लेकिन इसको प्रयोग करते हुए सावधानी रखनी चाहिए और हड़ताल को एक आखरी माध्यम के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए। मुख्यतः यह देखा गया है कि जो भी ट्रेड यूनियन व श्रमिकों के बीच विवाद उत्पन्न होते हैं उनका  निपटारा बातचीत के माध्यम से होने की संभावना अधिक रहती है संगठित क्षेत्र में बातचीत संभव सफल होने के लिए परिपक्व नेतृत्व के साथ प्रबंधन का भी सकारात्मक होना आवश्यक है। असंगठित क्षेत्र में यह प्रक्रिया थोड़ी जटिल है पर बातचीत से ठोस तर्क से मजदूरों की बात को प्रबंधन से मंगवाया जा सकता है जिसे नेतृत्व कुशलता भी कहते हैं।यह बाते उस सोच के सामने अपना पक्ष रखने का प्रयास हैं जिसके अनुसार ट्रेड यूनियन की भूमिका आज उतनी प्रासंगिक नहीं हैं।

अंतत यह यह कहाँ जा सकता हैं कि अगर ट्रेड यूनियन आंदोलन को मजबूत करना हैं तो युवाओं को नेतृत्व प्रदान करना आवश्यक हैं। एक और बात तकनीक से जान पहचान रखने वाला युवा जब ट्रेड यूनियन से जुड़ता हैं तो ट्रेड यूनियन को नई ऊर्जा मिलती हैं।

इस लेख के विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं
लेखक एक ट्रेड यूनियन पदाधिकारी हैं

 

 

 

 

  • Team Charcha

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