श्री अरविंद घोष एक विरल व्यक्तित्व थे-एक तरफ क्रांतिकारी, तो दूसरी तरफ दार्शनिक; एक तरफ शूरवीर, तो दूसरी तरफ कवि। उनकी जयंती 15 August पर हम सब उनके चरणों में कोटि-कोटि नमन अर्पित करते हैं
“सच्चा ज्ञान चिंतन से प्राप्त नहीं होता। यह वह है जो आप हैं; यह वह है जो आप बनते हैं।”

अरविंद घोष एक महान कवि आध्यात्मिक चिंतक में राष्ट्रवादी नेताओं में उनका नाम प्रसिद्ध है उनका जन्म कोलकाता में हुआ था उनके पिता एक चिकित्सक थे अरविंद जी की शुरुआती पढ़ाई देश में हुई लेकिन बाद में वह इंग्लैंड से लेकर और कैंब्रिज विश्वविद्यालय में अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की वह प्रांत भारतीय सिविल परीक्षा भी पास की
स्वदेश वापसी और भारत की पहचान सन् 1893 में जब वे भारत वापस लौटे, तो उन्होंने अपनी धरती की संस्कृति, दर्शन और साहित्य का सूक्ष्म अवलोकन किया। इस दौरान उन्हें गहराई से अनुभव हुआ कि भारत में एक नए राष्ट्रीय पुनर्जागरण की अत्यंत आवश्यकता है।
बंगाल विभाजन
1905 में जब ब्रिटिश सरकार ने बंगाल का विभाजन किया, तो समूचा देश क्षुब्ध हो उठा। उन्होंने न केवल ‘स्वदेशी’ और ‘बहिष्कार’ के प्रस्तावों का जोरदार समर्थन किया, बल्कि इसे जन-जन का अभियान बना दिया। अपनी लेखनी और समाचार-पत्रों के माध्यम से उन्होंने उस समय की सामाजिक चेतना को एक नई दिशा प्रदान की।
युवाशक्ति पर अटूट विश्वास
श्री अरविंद सदैव मानते रहे कि युवा पीढ़ी ही देश के नवनिर्माण की सबसे बड़ी शक्ति है।
स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें कारावास की यातना भी सहनी पड़ी।
परंतु जेल की उन कालकोठरियों में भी अरविंद जी का अध्यात्म जागृत रहा। यहीं पर उन्होंने योग और ध्यान की साधना को गहनता से अपनाया, जिसके फलस्वरूप उनका जीवन दर्शन पूर्णतः बदल गया। यह स्थिति उनके भीतर के क्रांतिकारी को एक महान दार्शनिक में परिवर्तित करने का प्रमुख मोड़ साबित हुई।
एक कवि के रूप में उनकी कलम अत्यंत प्रभावशाली रही।
पुदुच्चेरी : शांति का पड़ाव
क्रांति की अग्नि से तप्त होकर अरविंद जी ने पुदुच्चेरी को अपनी कर्मस्थली बनाया। वहाँ उन्होंने श्री अरविंद आश्रम की स्थापना की, जो आज भी अध्यात्म-प्रेमियों के लिए आश्रम है। इसी आश्रम में बैठकर उन्होंने समस्त मानवता के कल्याण की नींव रखी और तमाम विचारों को संजोया।
5 दिसंबर 1950 को महापुरुष ने भौतिक शरीर त्याग दिया, परंतु उनके विचार आज भी उतने ही सजीव और प्रासंगिक हैं, जितने उस समय थे।
इस लेख का उद्देश्य महान स्वतंत्रता सेनानी श्री अरविंद घोष के जीवन, और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करना है। लेख में दी गई जानकारी उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों एवं विभिन्न संदर्भों से प्राप्त तथ्यों के आधार पर संकलित की गई है।






